शारदा जी शांति से दरवाजे से सटकर चुपचाप उनको जाते हुए देखती रहीं शारदा जी शांति से दरवाजे से सटकर चुपचाप उनको जाते हुए देखती रहीं
अपनी उस अनपढ़ गुरू को कभी भुला नहीं पाऊँगी। अपनी उस अनपढ़ गुरू को कभी भुला नहीं पाऊँगी।
मेरे लेखन की शुरुआत मेरे लेखन की शुरुआत
जब बाजी हाथ से निकल गई फिर क्या हो। जब बाजी हाथ से निकल गई फिर क्या हो।
मेरे से ज़्यादा चिड़िया को उस पौधे पर विश्वास था मेरे से ज़्यादा चिड़िया को उस पौधे पर विश्वास था
शायद, हम लोगों का धन्यवाद करने ही आई होगी......वह चिड़िया। शायद, हम लोगों का धन्यवाद करने ही आई होगी......वह चिड़िया।